आज हम आपसे चर्चा करने जा रहे हैं थामा फिल्म के बारे में। अब हम आपसे थामा फिल्म के बारे में बात करें तो दीवाली पर बॉक्स ऑफिस की रौनम दो फिल्मों के साथ जगमग हुई हैं। पहली फिल्म हैं ‘एक दीवाने की दीवानियत’ और दूसरी हैं ‘थामा’।
मैडॉक्स फिल्म ने स्त्री, स्त्री2, भेड़िया और मुंज्या के बाद प्रोड्यूसर दिनेश विजन फिल्म थामा को लेकर आए हैं जो रिलीज़ हुई हैं। इस फिल्म में पौराणिक कथाओं को आधार बनाकर प्रेम कहानी के साथ हॉरर कॉमेडी को गढ़ने की कोशिश की हैं। इस कहानी में ताज़गी का अभाव झलकता हैं।
इस फिल्म का शीर्षक थामा यानी की सबसे ताकतवार और बेतालों का नायक हैं, लेकिन उसकी दुनिया को फिल्म कम खंगालती हैं। हॉरर कॉमेडी के तौर पर प्रचारित सही मायने में इस फिल्म में हॉरर का तड़का कम हैं वहीं कॉमेडी दमदार नहीं बन पाई हैं।
क्या हैं ‘थामा’ फिल्म की कहानी?- Kya hain ‘thama’ film ki kahani?
इस फिल्म की कहानी की शुरुआत 323BC से होती हैं। प्राचीन यूनानी सम्राट सिकंदर जंगल से गुजर रहा होता हैं जब बेतालों का नायक यक्षासन उसको अपना शिकार बनाता हैं। बाद में कहानी वर्तमान में आ जाती हैं। दिल्ली के आज़ाद न्यूज़ चैनल का रिपोर्टर आलोक गोयल अपने दो दोस्तों के साथ ट्रैकिंग के लिए आया होता हैं।

जंगल में सेल्फी के चक्कर में अचानक भालू के आक्रमण से घायल होता हैं। जंगल में रहने वाली ताड़का उसकी जिंदगी बचाती हैं। उसके साथियों को उसके बारे में पता चलता हैं।
वह उसको शापित पर्वत पर कैद में रखे गए यक्षासन के सामने फेंकते हैं ताकि वो उसका खून पी स्कएं, लेकिन ताड़का उसको बचाकर ले जाती हैं। वो आलोक की जान बचाने की खातिर उसके साथ उसके घर आ जाती हैं।
नाटकीय घटनाक्रम के बाद ताड़का उसको अपने बारे में बताती हैं। इंसान और बेताल की दुनिया में संतुलन बना रहा पुलिस अधिकारी पीके यादव ताड़का को वापस जाने को कहता हैं, वो वापस जा रही होती हैं जब उसको रोकने आलोक आ जाता हैं।
उसकी कार एक्सीड़ेंट हो जाता हैं। ताड़का उसको बेताल बनाती हैं। इन सब के बाद आलोक की जिंदगी में क्या बदलाव आता हैं। ताड़का की ये गिलती किस प्रकार उस पर भारी पड़ती हैं, इसी के साथ कहानी आगे बढ़ जाती हैं।
जानिए भागवत फिल्म की कहानी के बारे में।
दो साल बाद आयुष्मान-खुराना आये थामा में नज़र- Do sal bad Ayushman-khurana aaye thama mein nazar
फिल्म ‘ड्रीम गर्ल 2’ की रिलीज़ के करीब दो साल बाद आयुष्मान खुराना थामा में नज़र आए हैं। यहाँ पर उनका किरदार अजीब सी परिस्थितियों में फंसे आम आदमी का लगता हैं। उसको वो सहजता से निभाते हैं। वो डर और उत्सुकता के भाव जगाते हैं लेकिन कमज़ोर स्क्रीन प्ले उनका दायरा सीमित करता हैं।

रश्मिकता मंदाना की आँखें हिरण जैसी खुबसूरत हैं। उनके जरिए वो अपने एक्सप्रेशंस को खूबसूरती से व्यक्त करती हैं। कुछ इमोशनल सीन्स में रश्मिका फीकी नज़र आ जाती हैं।
थामा को डॉयलॉग्स के जरिए भले ही खतरनाक बताया गया हो, लेकिन स्क्रीन पर ऐसा दिखता नहीं हैं। कमज़ोर लेखन के कारण नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी जैसे मंझे कलाकार उसको यादगार नहीं बना पाए हैं। आलोक के पिता की भूमिका में परेश रावल और माँ बनी गीता अग्रवाल महज़ कुछ सीन्स के बीच-बीच हंसी के पल लाते हैं।
वरुण धवन का कैमियों दिलचस्प मोड़ लाने में नाकामयाब दिखता हैं। इस लिहाज़ से ये कहना गलत नहीं होगा की मैडॉक फिलम्स की ये फिल्म हॉरर कॉमेडी यूनिवर्स की बाकी फिल्मों जैसा जादू नहीं दिखाती हैं और मैडॉक फिल्म्स के बाकी फिल्मों के जैसे दिल को थाम कर देखने जैसी नहीं बन पाई हैं।
आवश्यक जानकारी:- लॉर्ड कर्जन की हवेली फिल्म की कहानी के बारे में।
निष्कर्ष- Conclusion
ये हैं थामा फिल्म की कहानी से संबंधित जानकारियाँ हम आपसे आशा करते हैं की आपको जरुर पसंद आई होगी। इस जानकारी से आपको थामा फिल्म की कहानी से संबंधित हर प्रकार की जानकारियाँ प्राप्त होंगी।
इस जानकारी से आपको थामा फिल्म से संबंधित हर तरह की जानकारियाँ प्राप्त होंगी। अगर आपको हमारी दी हुई जानकारियाँ पसंद आए तो आप हमारी दी हुई जानकारियों को लाइक व कमेंट जरुर कर लें।
इससे हमें प्रोत्साहन मिलेगा ताकि हम आपको बहेतर-से-बहेतर जानकारियाँ प्राप्त करवा सकें। हमारा उद्देश्य आपको घुमराह करना नहीं हैं बल्कि आप तक सही जानकारियाँ प्राप्त करवाना हैं।
