दर्दभरे संवाद दिमाग में छोड़ेंगे कई सवाल

Vineet Bansal

आज हम आपसे चर्चा करने जा रहे हैं हक़ फिल्म के बारे में। अब हम आपसे हक़ फिल्म के बारे में बात करें तो सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई यामी गौतम और इमरान हाशमी की फिल्म ‘हक़’ बेहद प्रभाव छोड़ती हैं।

यह फिल्म उस प्रकार की फिल्म नहीं हैं की जो आपका ध्यान आकर्षित करें, अपनी आवाज़ बुलंद करे या अपने संदेश को सनसनीखेज बनाए, फिर भी, यह आपको इस प्रकार झकझोर देती हैं जैसा बहुत कम फिल्में कर पाती हैं। सुपर्ण वर्मा द्वारा निर्देशित, ‘हक़’ ऐतिहासिक शाहबानों मामले से प्रेरित हैं।

कभी-कभी मुहब्बत काफी नहीं होती हैं, हमें अपनी इज्जत भी चाहिए….। यह फिल्म हक़ में यानी गौतम का पात्र शाजिया बानो जब यह संवाद अपने पति की दूसरी बीवी के सामने कह देती हैं, तब साफ संदेश देती हैं की वह अपना हक़ चाहती हैं, वह भी पूरे सम्मान के साथ।

क्या हैं ‘हक़’ फिल्म की कहानी?- Kya hain Haq film ki kahani?

यह फिल्म साल 1985 में सर्वोच्च न्यायालय के उस ऐतिहासिक फैसले से प्रेरित हैं, जिसमें उन्होंने शाहबानों के हक़ में निर्णय सुनाया था की तलाक के बाद उसके पति अहमद खान को उसे गुजारा भत्ता देना होगा। इस निर्णय को जहाँ मुस्लिम पर्सनल ला में न्यायापालिका का हस्तक्षेप माना गया था। वहीं मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के संघर्ष की लड़ाई की और लोगों का ध्यान आकर्षित हुआ।

Kya hain Haq film ki kahani

इस फिल्म की कहानी साल 1985 में शाजिया बानो के टेप रिकॉर्डर के साथ हो रहे इंटरव्यू से हो जाती हैं। वह अपने वकील पति अब्बास खान के विरुद्ध गुजारा भत्ता पाने का केस जीत चुकी हैं। वहाँ से कहानी 17 साल पीछे जाती हैं। शाजिया और अब्बास की अरेंज मैरिज हो जाती हैं।

शाजिया एक अच्छी बेगम की तरह अब्बास का घर संभालती हैं। अब्बास उसको प्यार देता हैं। शादी के नौ साल बाद एक दिन अब्बास पाकिस्तान चला जाता हैं। वापस लौटता हैं तो साथ में दूसरी बीवी सायरा होती हैं। शाजिया, बेगम से पहली बेगम बन जाती हैं।

हालात कुछ ऐसे बनते हैं की अब्बास उसको तलाक दे देता हैं। कुछ महीने बाद वह पैसे भेजना बंद कर देता हैं। बाद में शाजिया अपने बच्चों के भरण-पोषण के लिए अदालत का दरवाज़ा खटखटाती हैं।

इस फिल्म की शुरुआत में साफ कर दिया गया की फिल्म सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले और जिग्ना वोरा की लिखी किताब बानो: भारत की बेटी से प्रेरित हैं। ऐसा करके फिल्म के निर्देशक और लेखक कहानी को फिल्मी दायरों में मनोरंजक तरीके से दिखाते हुए राजनीतिक पचड़ों और सांप्रदायिक बहस से दूर रख पाए हैं।

जानिए द ताज़ स्टोरी फिल्म की कहानी के बारे में।

संवाद काफी आकर्षित करते हैं- Samvad kafi akarshit karte hain

रेशू नाथ की लिखी कहानी और संवाद बेहद प्रभावशाली हैं। इसमें उन्हें सुपर्ण एस वर्मा जैसे अनुभवी निर्देशक का साथ मिला हैं, जो कोर्ट रुम ड्रामा बनाने में माहिर हैं।

Samvad kafi akarshit karte hain

विशेष बात यह हैं की मुस्लिम पर्सनल ला बनाम सेक्यूलर ला की इस लड़ाई में उन्होंने बिना ड्रामा किए सिर्फ खामियों पर प्रकाश डाला हैं। दूसरी कोर्ट रुम ड्रामा फिल्मों की तरह इसमें चीखना-चिल्लाना भी नहीं हैं।

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कुरान पढ़ने पर डाला गया ज़ोर- Kuran padhne par dala gaya zor

संवादों के जरिए उन पर भी कटाक्ष किया गया हैं जो बिना अपने धार्मिक ग्रंथ पढ़े सही और गलत का निर्णय करते हैं।

Kuran padhne par dala gaya zor

कुरान रखने, पढ़ने और समझने में बहुत फर्क होता हैं…, ना हम कौम के गद्दार हैं, न ही अपने किए पर शर्मसार हैं, हम सही हैं…., हमारी लड़ाई सुकून की नींद से सौदा कर चुकी थी….., जब कोई आपकी आवाज़ न सुने तो दर्द होता हैं…. जैसे संवाद तालियाँ बटोरते हैं। कुरान के पहले शब्द इकरा यानी की पढ़ों की बात करते हुए फिल्म मुस्लिम लड़कियों को कुरान पढ़ने की अहमियत पर गहराई से बात करती हैं।

आवश्यक जानकारी:- छठ फिल्म की कहानी के बारे में।

निष्कर्ष- Conclusion

ये हैं हक़ फिल्म से संबंधित जानकारियाँ हम आपसे आशा करते हैं की आपको जरुर पसंद आई होगी। इस जानकारी से आपको हक़ फिल्म की कहानी से संबंधित हर प्रकार की जानकारियाँ प्राप्त होंगी।

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