आज हम आपसे चर्चा करने जा रहे हैं पिहोवा के कैलाश धाम के बारे में। अब हम आपसे पिहोवा के कैलाश धाम के बारे में बात करें तो पिहोवा हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले में स्थित एक पवित्र तीर्थस्थल हैं। पूर्व में यह शहर “पृथूदक तीर्थ” के रुप में जाना जाता हैं। पिहोवा सरस्वती नदी के तट पर स्थित हैं और धार्मिक महत्तव बहुत अधिक हैं।
पिहोवा में कैलाश धाम एक धर्मशाला हैं। धर्मशाला में मंदिर परिसर हैं जिसमें शिवलिंग, माता काली, गजाना आदि मूर्तिया मौजूद हैं। यह मंदिर सरस्वती घाट के करीब हैं जहाँ तर्पण और पितृ-कर्म होते हैं।
पृथूदक तीर्थ पवित्र माना जाता हैं। ऐसा माना जाता हैं की पिहोवा में सरस्वती नदी तट पर स्नान करना बहुत पुण्यदायी होता हैं। यह कहा जाता हैं की यहाँ स्नान करने से अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता हैं। पिहोवा में पितृ-कर्म के लिए तीर्थयात्री आते हैं और यहाँ के पंडित-पंडिताएँ पारिवारिक पितृ रिकॉर्ड भी संभालते हैं। अब हम आपसे चर्चा करेंगे पिहोवा के कैलाश धाम के परिचय के बारे में।
पिहोवा में कैलाश धाम का परिचय- Pehowa mein Kailash Dham ka parichay
अब हम आपसे चर्चा करने जा रहे हैं पिहोवा में कैलाश धाम के परिचय के बारे में। अब हम आपसे पिहोवा में कैलाश धाम के परिचय के बारे में बात करें तो हरियाणा के पवित्र तीर्थस्थल पिहोवा में स्थित कैलाश धाम एक प्रमुख धार्मिक और आध्यात्मिक स्थल हैं।

पिहोवा को प्राचीन ग्रंथों में “पृथूदक तीर्थ” के नाम से वर्णित किया गया हैं और यहाँ सरस्वती नदी तट पर पितृ-कर्म, तर्पण और श्राद्ध करने की परंपरा अति प्राचीन मानी जाती हैं। इस पवित्र क्षेत्र में स्थित कैलाश धाम भक्तों के लिए श्रद्धा, शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा का एक महत्तवपूर्ण केंद्र हैं।
कैलाश धाम पिहोवा का मंदिर परिसर धार्मिक दृष्टि से अत्यंत मनोहर और शांत वातावरण वाला स्थल हैं। इसकी वास्तुकला, शिव शक्ति से युक्त वातावरण और देवालयों की श्रृंखला इस मंदिर को एक दिव्य आध्यात्मिक स्थान बनाती हैं। यहाँ भगवान शिव सहित विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित हैं, जहाँ दैनिक पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठान संपन्न होते रहते हैं।
कैलाश धाम के परिसर में स्थित धर्मशाला तीर्थयात्रियों को रहने की सुविधा प्रदान करती हैं। इससे यह पिहोवा आने वाले श्रद्धालुओं के लिए एक सुविधाजनक और प्रमुख ठिकाना बनता हैं।
सरस्वती नदी, कार्तिकेय मंदिर और पितृ-कर्म स्थल के निकट होने की वजह से यह तीर्थयात्रियों के लिए आध्यात्मिक यात्रा का एक महत्तवपूर्ण केंद्र माना जाता हैं। अब हम आपसे चर्चा करेंगे पिहोवा तीर्थ के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्तव के बारे में।
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पिहोवा तीर्थ के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्तव- Pehowa tirth ke aitihasik aur dharmik mahatva
अब हम आपसे चर्चा करने जा रहे हैं पिहोवा तीर्थ के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्तव के बारे में। अब हम आपसे पिहोवा तीर्थ के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्तव के बारे में बात करें तो प्राचीन काल में पिहोवा को “पृथूदक तीर्थ” कहते थे।

पिहोवा भारत के अत्यंत पवित्र और धार्मिक नगरों में से एक माना जाता हैं। यह हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले में स्थित हैं और सरस्वती नदी के तट पर बसा हुआ हैं। पौराणिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से इसका महत्तव अधिक गहरा और अनोखा हैं।
पौराणिक इतिहास में पिहोवा
पिहोवा का उल्लेख महाभारत, स्कंद पुराण, वामन पुराण तथा अन्य कई ग्रंथों में मिलता हैं। महाभारत के अनुसार पांडवों ने कुरुक्षेत्र युद्ध से पूर्व पिहोवा तीर्थ पर आकर अपने पितरों का तर्पण किया था ताकि उन्हें विजय और शुभ आशीर्वाद मिल सकें। स्कंद पुराण में पिहोवा को ऐसा स्थान बताया गया हैं जहाँ तर्पण करने से पितरों को मुक्ति मिलती हैं और व्यक्ति को अश्वमेध यज्ञ के समान फल मिलता हैं।
पृथूदक नाम का रहस्य
पिहोवा का प्राचीन नाम पृथूदक दो शब्दों से बना हैं “पृथु” का मतलब हैं राजा पृथु और “उदक” का मतलब हैं जल। ऐसा माना जाता हैं की राजा पृथु ने यहाँ अपने पिता का श्राद्ध और तर्पण किया था, जिसके कारण यह स्थान पितृ कर्म का प्रमुख केंद्र बना हैं।
सरस्वती नदी का पवित्र संबंध
पिहोवा भारत की पवित्र और दिव्य नदी सरस्वती के तट पर स्थित हैं। ऐसा माना जाता हैं की सरस्वती यहाँ अदृश्य रुप में प्रवाहित होती हैं और इस जल में स्नान करने से जीवन के पापों का नाश होता हैं। सरस्वती तट पर किए गए कर्म-श्राद्ध, तर्पण और दान बहुत पुण्यदायी माने जाते हैं।
पितृ-कर्म का वैश्विक केंद्र
पिहोवा दुनिया के उन कुछ स्थानों में हैं जहाँ पितृ-कर्म करने की हज़ारों वर्षों से परंपरा चली आ रही हैं। यहाँ के पंडे परिवारों के पास पीढ़ियों से पितरों के वंश-वृक्ष और परिवारों के रिकॉर्ड सुरक्षित हैं, जिन्हें ‘पोटो’ कहते हैं। हर वर्ष देश और विदेश से हज़ारों लोग पिहोवा पहुँचकर अपने पितरों का तर्पण करवाते हैं।
धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्तव
पिहोवा तीर्थ पर तर्पण करने से मनुष्य को पितृ-दोष से मुक्ति और कुल के कल्याण का आशीर्वाद मिलता हैं। यहाँ दान करने वाले को अनंत पुण्य प्राप्त होने की मान्यता हैं। पिहोवा को कुंडलिनी शक्ति और पितृ-ऊर्जा से युक्त स्थान माना जाता हैं। इसलिए यहाँ का आध्यात्मिक वातावरण अत्यंत शांत और ऊर्जावान हैं।
वर्तमान समय में पिहोवा
आज पिहोवा अपनी हज़ारों वर्षों की परंपरा के साथ उतना ही पवित्र और लोकप्रिय हैं। यहाँ पूरे वर्ष श्रद्धालुओं की भीड़ रहती हैं। विशेषकर पितृ-पक्ष और अमावस्या के दिनों में यहाँ देश-विदेश से भक्त आते हैं। अब हम आपसे चर्चा करेंगे सरस्वती नदी और पृथूदक तीर्थ के संबंध के बारे में।
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सरस्वती नदी और पृथूदक तीर्थ का संबंध- Saraswati nadi aur prthoodak tirth ka sambandh
अब हम आपसे चर्चा करने जा रहे हैं सरस्वती नदी और पृथूदक तीर्थ के संबंध के बारे में। अब हम आपसे सरस्वती नदी और पृथूदक तीर्थ के संबंध के बारे में बात करें तो पिहोवा का सबसे गहरा धार्मिक और आध्यात्मिक संबंध सरस्वती नदी से हैं।

यह रिश्ता हज़ारों वर्षों पुराना हैं और हिंदू मान्यता, पुराणों व इतिहास में विशिष्ट स्थान रखता हैं। पिहोवा को पवित्रता का मुख्य आधार सरस्वती का यहाँ प्रवाहित होना माना जाता हैं।
सरस्वती नदी का पवित्र प्रवाह
प्राचीन काल में सरस्वती नदी पिहोवा क्षेत्र में दृश्य रुप से प्रवाहित होती थी। समय के साथ नदी का प्रवाह भूमिगत हो गया, परंतु तीर्थ पर इसकी अदृश्य धारा आज भी मानी जाती हैं। पौराणिक ग्रंथों में पिहोवा को वह स्थान बताया गया हैं जहाँ सरस्वती तीर्थ रुप में अपने सबसे पवित्र प्रवाह में थीं।
पृथूदक तीर्थ का जल- “पितृ उद्धारक”
राजा पृथु ने यहाँ सरस्वती के जल से अपने पिता का श्राद्ध और तर्पण किया था। तब से यह स्थान पितरों को तृप्त करने और उनके मोक्ष हेतु सर्वोत्तम माना जाने लगा। सरस्वती का यह पवित्र जल पितृ-शांति का कारक माना जाता हैं।
तर्पण और श्राद्ध का सर्वोत्तम स्थल
सरस्वती नदी के तट पर श्राद्ध करने का महत्तव पुराणों में अधिक बताया गया हैं। पिहोवा में सरस्वती तट पर किया गया तर्पण पितरों को मोक्ष देता हैं, पितृ-दोष को दूर करता हैं और परिवार के कल्याण की कामना पूर्ण करता हैं। इसलिए पिहोवा पृथ्वी के कुछ चुनिंदा प्रमुख पितृ-कर्म केंद्रों में से एक हैं।
सरस्वती-ब्रह्मा पूजा का केंद्र
कुछ प्राचीन मान्यताओं में पिहोवा को सरस्वती का निवास स्थान और ब्रह्मा जी की पूजा स्थली माना जाता हैं क्योंकि सरस्वती को सृष्टि की देवी और ज्ञान की अधिष्ठात्री कहते हैं।
सरस्वती नदी की पवित्रता का वर्णन पुराण
स्कंद पुराण और वामन पुराण में ऐसा कहा गया हैं की “पृथूदक में सरस्वती का स्नान और तर्पण मनुष्य को अश्वमेध यज्ञ के तुल्य फल देता हैं। यहाँ के सरस्वती तट पर मोक्ष, पुण्य और पितृ-तृप्ति का अधिक महत्तव बताया गया हैं। अब हम आपसे चर्चा करेंगे पिहोवा में पितृ-कर्म की परंपरा के बारे में।
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पिहोवा में पितृ-कर्म की परंपरा- Pehowa mein pitra-karam ki parampara
अब हम आपसे चर्चा करने जा रहे हैं पिहोवा में पितृ-कर्म की परंपरा के बारे में। अब हम आपसे पिहोवा में पितृ-कर्म की परंपरा के बारे में बात करें तो पिहोवा जिसको प्राचीनकाल में पृथूदक तीर्थ कहते थे। पिहोवा पूरे भारत में पितृ-कर्म और श्राद्ध के लिए अत्यंत प्रसिद्ध एवं पवित्र स्थान हैं।

सरस्वती नदी के तट पर बसे इस तीर्थ की पवित्रता और आध्यात्मिक ऊर्जा का सबसे बड़ा कारण हैं- यहाँ हज़ारों वर्षों से निरंतर चली आ रही पितृ-पूजन और तर्पण की परंपरा।
पिहोवा-पितृ-कर्म का विश्वविख्यात केंद्र
पिहोवा भारत के चुनिंदा प्रमुख स्थलों में से हैं। जहाँ श्राद्ध, पिंडदान, तर्पण, नारायणबलि, और पितृ-शांति पूजा विशेष रुप से किए जाते हैं। यहाँ की धार्मिक मान्यता हैं की सरस्वती के पवित्र जल में किए गए तर्पण से पितरों को तृप्ति और मोक्ष प्राप्त होता हैं।
पांडवों ने भी किया था पितृ-तर्पण
पुराणों और महाभारत के अनुसार पांडवों ने युद्ध से पूर्व पिहोवा में अपने पितरों का तर्पण किया था। यह कहा जाता हैं की यहाँ श्राद्ध करने से मनुष्य को अश्वमेध यज्ञ के तुल्य पुण्य प्राप्त होता हैं।
पिहोवा के पुरोहितों द्वारा रखे जाने वाले पारिवारिक रिकॉर्ड
पिहोवा के पुरोहित पीढ़ी दर पीढ़ी परिवारों के वंश-वृक्ष और पितृ-कर्म रिकॉर्ड संभालकर रखते हैं। ये रिकॉर्ड कई शताब्दियों पुराने हैं, परिवारों की कई पीढ़ियों के नामों को सुरक्षित रखते हैं और तीर्थयात्रियों को उनके पितरों की जानकारी प्रदान करते हैं। यह परंपरा पिहोवा को अन्य तीर्थस्थलों से विशिष्ट बनाती हैं।
श्राद्ध और तर्पण का महत्तव
पिहोवा में किया गया श्राद्ध माना जाता हैं की पितरों को शांति प्रदान करता हैं, परिवार को सुख-समृद्धि और स्वास्थ्य का आशीर्वाद देता हैं और आत्मा के लिए मोक्षदायक होता हैं। यहाँ के तर्पण स्थल में एक अद्भुत ऊर्जा और शांति अनुभव की जाती हैं।
सरस्वती नदी का अदृश्य प्रवाह
पिहोवा का पितृ-कर्म इसलिए अत्यंत प्रभावकारी माना जाता हैं क्योंकि यहाँ सरस्वती नदी अदृश्य रुप में आज भी प्रवाहित मानी जाती हैं। सरस्वती नदी के जल को पवित्रतम और पितृ-तर्पण हेतु सर्वोत्तम माना जाता हैं। शास्त्रों में “सरस्वती तट का श्राद्ध” श्रेष्ठ बताया गया हैं।
पितृ-पक्ष में लाखों श्रद्धालुओं का आगमन
हर वर्ष पितृ-पक्ष में हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि विदेशों से भी हज़ारों-लाखों लोग पिहोवा में पितृ-कर्म करने आते हैं। इन सब के दौरान पूरे नगर का वातावरण अत्यंत आध्यात्मिक और श्रद्धायुक्त हो जाता हैं। अब हम आपसे चर्चा करेंगे कैलाश धाम और पिहोवा से जुड़ी मान्यताएँ व कथाएँ के बारे में।
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कैलाश धाम और पिहोवा से जुड़ी मान्यताएँ व कथाएँ- Kailash dham aur pehowa se judi manyata va katha
अब हम आपसे चर्चा करने जा रहे हैं कैलाश धाम और पिहोवा से जुड़ी मान्यताएँ व कथाएँ के बारे में। अब हम आपसे कैलाश धाम और पिहोवा से जुड़ी मान्यताएँ व कथाएँ के बारे में बात करें तो कैलाश धाम और पिहोवा तीर्थ स्वयं में अत्यंत पवित्र, ऐतिहासिक और गूढ़ आध्यात्मिक स्थल हैं।

इनसे जुड़ी कई मान्यताएँ और धार्मिक कथाएँ स्थानीय परंपरा तथा प्राचीन ग्रंथों में वर्णित हैं।
पांडवों द्वारा पितृ-तर्पण की कथा
पौराणिक मान्यता के अनुसार महाभारत युद्ध से पहले पांडवों ने अपने पितरों की शांति और आशीर्वाद प्राप्त करने हेतु पिहोवा में तर्पण किया था। यह माना जाता हैं की पिहोवा में तर्पण करने से पांडवों को विजय का मार्ग प्रशस्त हुआ हैं। इसलिए आज भी यहाँ किए गए श्राद्ध को विजय, सफलता और कल्याण से जोड़ा जाता हैं।
राजा पृथु का पितृ-कर्म
एक लोकप्रिय कथा हैं की राजा पृथु ने अपने पिता की आत्मा को मोक्ष दिलाने के लिए सरस्वती तट पर तर्पण किया था। इस घटना की वजह से इसका नाम पड़ा “पृथूदक”। यह कथा इस स्थान को पितृ-शांति का सर्वोत्तम केंद्र बनाती हैं।
सरस्वती नदी की अदृश्य धारा और दिव्यता
यह माना जाता हैं की सरस्वती नदी पिहोवा क्षेत्र में अब भी अदृश्य रुप से प्रवाहित होती हैं। तर्पण का जल सीधे पितृलोक तक पहुँचता हैं। यह भी कहा जाता हैं की सरस्वती तट का जल पापों का नाश करता हैं और आत्मा को शुद्ध करता हैं।
कैलाश धाम की कथा
एक स्थानीय लोकप्रिय कथा के अनुसार एक शिवभक्त ने वर्षों तक पिहोवा के सरस्वती तट पर तपस्या की थी। शिव जी उससे प्रसन्न होकर यहाँ शांति और मोक्ष का वरदान देकर गए थे। बाद में इस तपस्थल पर कैलाश धाम परिसर का निर्माण हुआ था। इसलिए भक्त मानते हैं की यहाँ की शिव-ऊर्जा अत्यंत शक्तिशाली हैं।
पांडवों के विश्राम स्थल की मान्यता
कुछ स्थानीय परंपराओं में यह कथित हैं की पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान इस क्षेत्र में समय बिताया था। उन्होंने सरस्वती तट से जल ग्रहण कर भगवान शिव की आराधना की थी। यही वजह हैं की पिहोवा में शिवभक्ति का विशेष प्रभाव दिखाई देता हैं।
पंडों की “अखंड परंपरा” की अनोखी कथा
पिहोवा के पुरोहितों के बारे में माना जाता हैं की उनके पूर्वजों को स्वयं ऋषियों ने पितृ-पूजन की विधियाँ सौंपी थी। इसलिए उनका काम “ध्यान-साधना का कार्य” माना जाता हैं।
पीढ़ियों से वे परिवारों का वंशवृक्ष संभालते आ रहे हैं। यह परंपरा अभी भी जीवित और दिव्य मानी जाती हैं। अब हम आपसे चर्चा करेंगे पिहोवा में आयोजित धार्मिक मेले और उत्सव के बारे में।
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पिहोवा में आयोजित धार्मिक मेले और उत्सव- Pehowa mein ayojit dharmik mele aur utsav
अब हम आपसे चर्चा करने जा रहे हैं पिहोवा में आयोजित धार्मिक मेले और उत्सव के बारे में। अब हम आपसे पिहोवा में आयोजित धार्मिक मेले और उत्सव के बारे में बात करें तो पिहोवा हरियाणा का एक प्रमुख धार्मिक स्थल हैं जहाँ वर्षभर विभिन्न आध्यात्मिक कार्यक्रम, मेले और उत्सव आयोजित होते रहते हैं।

यहाँ पितृ-कर्म और सरस्वती तट की पवित्रता के कारण विशेष अवसरों पर हज़ारों श्रद्धालु जुटते हैं।
पितृ पक्ष का प्रमुख मेला
पिहोवा का सबसे बड़ा और महत्तवपूर्ण आयोजन पितृ पक्ष में होता हैं। भाद्रपद या आश्विन मास में यह मेला 16 दिनों तक चलता हैं। देशभर से लाखों लोग अपने पितरों का तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान करने आते हैं।
यहाँ सरस्वती तट पर विशेष व्यवस्था की जाती हैं। ब्रह्माण समाज के हज़ारों पुरोहित श्राद्ध-कर्म संपन्न कराते हैं। यह समय पिहोवा का सबसे भीड़भाड़ वाला और धार्मिक मौसम माना जाता हैं।
माघ मेले एवं स्नान
माघ मास में विशेष रुप से मकर संक्रांति से लेकर माघ पूर्णिमा तक पिहोवा में स्नान और तर्पण अत्यंत शुभ माना जाता हैं। यहाँ पर श्रद्धालु सरस्वती तट पर स्नान करते हैं।
विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान, भंडारे और कीर्तन आयोजित होते हैं। इन सब के साथ ही माघ मेला भी लगता हैं। जिसमें स्थानीय हस्तशिल्प, प्रसाद साम्रगी और आध्यात्मिक कार्यक्रम शामिल होते हैं।
शिवरात्रि मेला
पिहोवा के कैलाश धाम, शिव मंदिरों और अन्य प्रमुख शिवालयों में महाशिवरात्रि बड़े उत्साह के साथ मनाई जाती हैं। पूरे नगर में कावड़ यात्रियों और भक्तों की भीड़ होती हैं। रात्रि जागरण, रुद्राभिषेक और भव्य शिव बारात का आयोजन होता हैं। कैलाश धाम में विशेष पूजा और झांकी भी निकाली जाती हैं।
नवरात्रि और दुर्गा पूजन उत्सव
शरद और चैत्र नवरात्रि दोनों में पिहोवा में माँ दुर्गा की विशेष पूजा की जाती हैं। कई मंदिरों में जागरण, हवन, कन्या-पूजन और भजन संध्या होती हैं। गरबा और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं।
दीपावली और कार्तिक स्नान
दीपावली पर पिहोवा के मंदिरों में दीपों की सजावट और विशेष लक्ष्मी पूजन होता हैं। कार्तिक मास में सरस्वती तट पर स्नान और दान अत्यंत शुभ माना जाता हैं। पूर्णिमा पर बड़ा स्नान और हवन-कर्म आयोजन होते हैं।
गीता जयंती का समारोह
गीता जयंती का मुख्य आयोजन कुरुक्षेत्र में होता हैं। परंतु पिहोवा भी इस धर्मक्षेत्र का हिस्सा होने के कारण गीता जयंती में धार्मिक गतिविधियों से गूंजता रहता हैं। इससे तीर्थ यात्रियों का प्रवाह बढ़ता हैं। पिहोवा में गीता प्रवचन और दान-पुण्य के कार्यक्रम होते हैं।
आवश्यक जानकारी:- 51 शक्ति पीठों की यात्रा के बारे में।
निष्कर्ष- Conclusion
ये हैं पिहोवा का कैलाश धाम से संबंधित जानकारियाँ हम आपसे आशा करते हैं की आपको जरुर पसंद आई होगी। इस जानकारी से आपको पिहोवा का कैलाश धाम की कहानी से संबंधित हर प्रकार की जानकारियाँ प्राप्त होंगी।
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