आज हम आपसे चर्चा करने जा रहे हैं अधिमास के बारे में। अब हम आपसे अधिमास के बारे में बात करें तो हिंदू कैलेंडर चांद के चरणों पर आधारित हैं, लेकिन साथ ही सूर्य के ग्रहण से भी तालमेल रखा जाता हैं। इस अंतर को संतुलित करने के लिए हर कुछ समय में एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता हैं। जिसको कहा जाता हैं अधिमास।
हम आपको बता देते हैं की 2026 से पहले 2023 में भी अधिमास आ चुका हैं। 2023 में अधिमास अधिश्रावण के रुप में आ चुका हैं। अब 2026 में अधिमास अधिज्येष्ठ के रुप में आ रहा हैं। आगे अधिमास 2029 में आएगा। 2029 में अधिमास अधिचैत्र के रुप में आएगा। अब हम आपसे चर्चा करेंगे 2026 में अधिमास के आने के बारे में।
2026 में अधिमास का आना- 2026 mein Adhik Maas ka ana
अब हम आपसे चर्चा करने जा रहे हैं 2026 में अधिमास के आने के बारे में। अब हम आपसे 2026 में अधिमास के आने के बारे में बात करें तो हिंदू पंचांग की गणना चंद्र और सूर्य दोनों की गतियों पर आधारित की जाती हैं। चंद्र वर्ष लगभग 354 दिन का होता हैं, जबकि सौर वर्ष लगभग 365 दिन का होता हैं। इस अंतर को संतुलित करने के लिए कुछ वर्षों में अधिमास जोड़ा जाता हैं। इस पंचांगीय व्यवस्था के कारण 2026 में अधिमास का आना एक विशेष घटना मानी जाती हैं।

इस वर्ष सूर्य की राशि-स्थिति के अंदर दो पूर्ण चंद्र मास आ जाने से एक सामान्य ज्येष्ठ और उसके बाद अधिज्येष्ठ का निर्माण होता हैं। इसको सामान्य भाषा में “ज्येष्ठ मास दो बार आना” कहते हैं। इन सब के बाद अगला मास आषाढ़ प्रारम्भ होता हैं।
धार्मिक दृष्टि से ज्येष्ठ मास स्वयं ही व्रत, दान, जलसेवा और तप का महीना माना जाता हैं। जब यह मास अधिमास के साथ आ जाता हैं तब भक्ति, जप, साधना और पुण्य कर्मों के लिए इसे विशेष अवसर माना जाता हैं। शास्त्रों के अनुसार अधिमास में निष्काम भक्ति, हरिनाम-स्मरण और दान का महत्तव बढ़ जाता हैं, जबकि बड़े मांगलिक संस्कार सामान्यत: नहीं किए जाते हैं।
इसी प्रकार 2026 में ज्येष्ठ मास का दो बार आना दुर्लभ पंचांगीय संयोग हैं जो धार्मिक साधना और आध्यात्मिक उन्नति के लिए एक महत्तवपूर्ण अवसर प्रदान करता हैं। अब हम आपसे चर्चा करेंगे 2026 में दो ज्येष्ठ मास क्यों आएँगे?
2026 में दो ज्येष्ठ मास क्यों आएँगे?- 2026 Mein do jyeshth maas kyon ayenge?
अब हम आपसे चर्चा करने जा रहे हैं 2026 में दो ज्येष्ठ मास क्यों आएँगे? अब हम आपसे 2026 में दो ज्येष्ठ मास के आने के बारे में बात करें तो 2026 में दो बार ज्येष्ठ मास आने का कारण हिंदू पंचांग की चंद्र-सौर गणना प्रणाली हैं।

हिंदू कैलेंडर सिर्फ सूर्य या सिर्फ चंद्र पर आधारित नहीं होता, बल्कि दोनों के संतुलन से चलता हैं। इस संतुलन के कारण कुछ वर्षों में अधिमास आता हैं, और उसी वर्ष कोई मास दो बार दिखाई देता हैं।
चंद्र और सौर वर्ष का अंतर
1 चंद्र माह= 29.5 दिन
12 चंद्र माह= 354 दिन
1 सौर वर्ष= 365.24 दिन
हर वर्ष लगभग 11 दिनों का अंतर बनता हैं। जब यह अंतर बढकर लगभग 30 दिन होता हैं, तब पंचांग में एक अतिरिक्त चंद्र मास जोड़ा जाता हैं, जिसे कहते हैं अधिमास।
सूर्य की राशि-स्थिति और अधिमास
हिंदू पंचांग में नया मास तब माना जाता हैं जब सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता हैं। यदि किसी चंद्र मास के दौरान सूर्य की कोई संक्रांति नहीं होती तब वह मास अधिमास बन जाता हैं।
2026 में विशेष स्थिति
सूर्य वृषभ और मिथुन राशि के बीच अपनी स्थिति में रहता हैं। उस अवधि में दो पूर्ण चंद्र मास आ जाते हैं। ये दोनों मास ज्येष्ठ मास से ही जाने जाते हैं। इसीलिए पहला सामान्य ज्येष्ठ मास और दूसरा अधि ज्येष्ठ मास होता हैं। इस कारण 2026 में ज्येष्ठ मास दो बार आएगा और उसके बार आषाढ़ मास शुरु होगा।
चंद्र महीनों और सौर वर्ष के अंतर को ठीक करने के लिए पंचांग में एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता हैं। वह अतिरिक्त महीना ज्येष्ठ मास के साथ जुड़ गया। इसलिए 2026 में दो बार ज्येष्ठ मास आएँगे। अब हम आपसे चर्चा करेंगे पहला ज्येष्ठ मास और दूसरा ज्येष्ठ मास के अंतर के बारे में।
पहला ज्येष्ठ मास और दूसरा ज्येष्ठ मास का अंतर- Pehla Jyeshtha maas aur dusra jyeshtha maas ka antar
अब हम आपसे चर्चा करने जा रहे हैं पहला ज्येष्ठ मास और दूसरा ज्येष्ठ मास के अंतर के बारे में। अब हम आपसे पहला ज्येष्ठ मास और दूसरा ज्येष्ठ मास के अंतर के बारे में बात करें तो 2026 जैसे वर्षों में जब ज्येष्ठ मास दो बार आता हैं तब उनमें स्वरुप, पंचांगीय स्थिति और धार्मिक प्रयोग के आधार पर स्पष्ट अंतर होता हैं।

पहला ज्येष्ठ मास (सामान्य ज्येष्ठ)
यह नियमित चंद्र मास होता हैं। इस मास में सूर्य की संक्रांति होती हैं। सामान्य रुप से सभी नियत पर्व, व्रत और तिथियाँ इसी मास में आती हैं। ज्येष्ठ मास से संबंधित प्रमुख पर्व निर्जला एकादशी, वट सावित्री व्रत, गंगा दशहरा और शनि जयंती हैं। शास्त्रसम्मत रुप से सब परंपरागत धार्मिक क्रियाएँ की जाती हैं।
दूसरा ज्येष्ठ मास (अधिक ज्येष्ठ)
इस मास को अधिज्येष्ठ मास या अधिक ज्येष्ठ कहते हैं। इस मास में कोई सूर्य संक्रांति नहीं होती हैं। पंचांग में यह मास अधिमास के रुप में जोड़ा जाता हैं। सामान्यत: इस मास में नियमित पर्व नहीं आते हैं। विशेष रुप से इसे भक्ति, जप, तप और दान के लिए माना जाता हैं। इस मास को पुरुषोत्तम मास भी कहते हैं। अब हम आपसे चर्चा करेंगे चंद्र-सौर गणना और अधिमास के सिद्धांत के बारे में।
चंद्र-सौर गणना और अधिमास का सिद्धांत- Chandra-surya ganana aur adhimas ka siddhant
अब हम आपसे चर्चा करने जा रहे हैं चंद्र-सौर गणना और अधिमास के सिद्धांत के बारे में। अब हम आपसे चंद्र-सौर गणना और अधिमास के सिद्धांत के बारे में बात करें तो हिंदू पंचांग की सबसे बड़ी विशेषता यह हैं की वह चंद्र और सौर दोनों की गतियों को साथ-साथ मानकर चलता हैं। इसी वजह से इसको चंद्र-सौर पंचांग कहते हैं। अधिमास का सिद्धांत इस संतुलन व्यवस्था से संबंधित हैं।

चंद्र गणना
एक चंद्र माह अमावस्या से अमावस्या या पूर्णिमा से पूर्णिमा तक होता हैं।
1 चंद्र माह= 29.5 दिन
12 चंद्र माह= 354 दिन
सौर गणना
सौर वर्ष सूर्य के एक पूर्ण भ्रमण पर आधारित हैं। सूर्य लगभग हर 30 दिन में एक राशि बदलता हैं।
1 सौर वर्ष= 365.24 दिन
चंद्र और सौर वर्ष में अंतर
चंद्र वर्ष और सौर वर्ष में हर साल लगभग 11 दिन का अंतर पड़ता हैं। यदि इस अंतर को न सुधारा जाए तब त्योहार और ऋतुएँ धीरे-धीरे आगे-पीछे हो जाएँ।
अधिमास का सिद्धांत
जब यह अंतर लगभग 30 दिन के बराबर हो जाता हैं तब पंचांग में एक अतिरिक्त चंद्र मास जोड़ा जाता हैं। इसे ही अधिमास, मलमास या पुरुषोत्तम मास कहते हैं। यदि किसी चंद्र मास में सूर्य की कोई संक्रांति नहीं होती तब वह चंद्र मास अधिमास कहलाता हैं। अधिमास लगभग हर 2 वर्ष 8-9 महीने में एक बार आता हैं। सामान्यत: 19 वर्षों में 7 अधिमास आते हैं।
धार्मिक दृष्टि
अधिमास को भगवान विष्णु को समर्पित माना गया हैं। इस महीने में जप, तप, दान, कथा, हरिनाम स्मरण का विशेष महत्तव हैं। सामान्यत: विवाह, गृहप्रवेश जैसे मांगलिक कार्य नहीं किए जाते हैं।
हिंदू पंचांग की वैज्ञानिक सोच और प्राकृतिक संतुलन को चंद्र-सौर गणना और अधिमास का सिद्धांत बताता हैं। यह व्यवस्था सुनिश्चित करती हैं की धार्मिक पर्व और ऋतुएँ सदैव अपने सही समय पर रहें और यही वजह हैं की कभी-कभी किसी मास का दो बार आना देखने को मिलता हैं। अब हम आपसे चर्चा करेंगे अधिमास के धार्मिक महत्तव के बारे में।
अधिमास का धार्मिक महत्तव- Adhik Maas ka dharmik mahatva
अब हम आपसे चर्चा करने जा रहे हैं अधिमास के धार्मिक महत्तव के बारे में। अब हम आपसे अधिमास के धार्मिक महत्तव के बारे में बात करें तो हिंदू पंचांग के अनुसार जब किसी वर्ष में एक चंद्र मास में सूर्य का संक्रांति परिवर्तन नहीं होता तब उस अतिरिक्त महीने को अधिमास कहते हैं। इसे पुरुषोत्तम मास भी कहते हैं, क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण ने इसे अपना नाम प्रदान किया था।

धार्मिक महत्तव
- भगवान विष्णु की विशेष कृपा:- अधिमास भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता हैं। इस मास में की गई भक्ति, जप, तप और दान का फल अनेक गुना मिलता हैं।
- पापों का नाश:- शास्त्रों के अनुसार अधिमास में सच्चे मन से पूजा-पाठ करने से पूर्वजन्म और इस जन्म के पापों का क्षय होता हैं।
- मोक्ष की प्राप्ति:- अधिमास में व्रत, भोजन, कीर्तन और विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करने से मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता हैं।
- शुभ कार्य वर्जित, भक्ति कार्य श्रेष्ठ:- विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य इस मास में नहीं किए जाते हैं। परंतु धार्मिक कार्य जैसे की कथा श्रवण, हरिनाम जप, दान-पुण्य और व्रत अत्यंत फलदायी माने जाते हैं।
अधिमास में विवाह या अन्य मांगलिक संस्कार, नए व्यापार या शुभ आरम्भ, तामसिक भोजन जैसे की मांस, मंदिरा आदि, झूठ, क्रोध, निंदा और विवाद जैसी चीज़ों को करने से दूर रहना चाहिए या ये चीज़ें सामान्यत: वर्जित मानी जाती हैं।
यह मास आत्मशुद्धि और भक्ति का उत्तम अवसर हैं। सांसारिक इच्छाओं से हटकर यदि इस मास को भगवान के स्मरण में लगाया जाए तब जीवन में शांति, पुण्य और आध्यात्मिक उन्नति निश्चित होती हैं। अब हम आपसे चर्चा करेंगे अधिमास के प्रमुख पर्व के बारे में।
अधिमास के प्रमुख पर्व- Adhik Maas ke pramukh parv
अब हम आपसे चर्चा करने जा रहे हैं अधिमास के प्रमुख पर्व के बारे में। अब हम आपसे अधिमास के प्रमुख पर्व के बारे में बात करें तो मुख्यत: अधिमास को भक्ति और साधना का मास माना जाता हैं। इसी कारण इसमें सामान्य महीनों की तरह अधिक पर्व नहीं होते हैं, फिर भी कुछ विशेष धार्मिक तिथियाँ और आयोजन अत्यंत महत्तवपूर्ण माने जाते हैं।

प्रमुख पर्व
- पुरुषोत्तम मास प्रारंभ:- अधिमास के प्रारंभ से ही भगवान विष्णु की विशेष पूजा की जाती हैं। कई भक्त पूरे मास व्रत या नियम धारण करते हैं।
- पुरुषोत्तम एकादशी:- यह अधिमास की सबसे प्रमुख तिथि मानी जाती हैं। इस दिन व्रत, विष्णु पूजन, तुलसी अर्चन और हरिनाम जप का विशेष महत्तव होता हैं। यह भी कहा जाता हैं की इस एकादशी के व्रत से सभी एकादशियों का फल प्राप्त होता हैं।
- अधिमास की पूर्णिमा:- पूर्णिमा तिथि पर भगवान विष्णु का विशेष पूजन, दान और सत्यानारायण कथा का आयोजन किया जाता हैं। इस दिन ब्राह्मण भोजन और गौदान का भी विशेष महत्तव हैं।
- अधिमास अमावस्या:- अधिमास अमावस्या के दिन पितृ तर्पण, दान और स्नान का विशेष महत्तव होता हैं। इस दिन गंगा या अन्य पवित्र नदियों में स्नान करने से विशेष पुण्य प्राप्त होता हैं।
- पुरुषोत्तम मास व्रत:- कई भक्त पूरे अधिमास में व्रत या एक समय भोजन का संकल्प लेते हैं। यह व्रत अत्यंत पुण्यदायी माना जाता हैं।
अधिमास में कोई नया मांगलिक पर्व या संस्कार नहीं होता, परंतु भक्ति पर्वों का महत्तव बढ़ जाता हैं। हर दिन स्वयं में पर्व के समान माना गया हैं यदि वह भगवान के स्मरण में व्यतीत हो। अधिमास में पर्व कम हैं, पर आध्यात्मिक फल ज्यादा हैं। इस मास का प्रत्येक दिन भजन, जप, व्रत और दान से पर्व समान बन जाता हैं।
निष्कर्ष- Conclusion
ये हैं अधिमास से संबंधित जानकारियाँ हम आपसे आशा करते हैं की आपको जरुर पसंद आई होगी। इस जानकारी से आपको अधिमास से संबंधित हर प्रकार की जानकारियाँ जरुर प्राप्त होंगी।
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