आज हम आपसे चर्चा करने जा रहे हैं सितारों के सितारे फिल्म के बारे में। अब हम आपसे सितारों के सितारें फिल्म के बारे में बात करें तो आमिर खान ‘सितारे जमीन पर’ की सफलता के बाद फिल्म ‘सितारों के सितारे’ डॉक्यूमेंट्री लेकर आए हैं, जिसमें उन्होंने स्पेशल चाइल्ड के पेरेंट की कहानी दिखाई थी। किस तरह से स्पेशल एबल बच्चों के माता-पिता को इस समाज की दुत्कार सहन से लेकर किस-किस तरह से संघर्ष करना पड़ता हैं, इस कहानी को आमिर ने बहुत ही खूबसूरती से पेश किया हैं।
मैं दुनिया की इकलौती माँ होउंगी जो चाहेगी की मेरे जाने से पहले बच्चे दुनिया छोड़कर चले जाए। अगर ऐसा हुआ यह मुझे मार देगा, लेकिन उनकी सुरक्षा को लेकर मैं किसी चिंता में नहीं मरुंगी। जब ‘सितारों के सितारें’ डॉक्यूमेंट्री में एक स्पेशल चाइल्ड की माँ यह कहती हैं तो आँखें भर आती हैं। यह सच किसी क्रूरता का नहीं, बल्कि उस गहरे भय, असहायता और समाज से मिले तिरस्कार का नतीज़ा हैं, जिसे ऐसे माता-पिता हर दिन जीते हैं।
क्या हैं सितारों के सितारें की कहानी?- Kya hain Sitaron ke Sitaren ki kahani?
डॉक्यूमेंट्री की शुरुआत इन माता-पिता के सपनों से होती हैं। हर आम परिवार की तरह एक स्वस्थ, सामान्य बच्चे की आकांक्षा, लेकिन जन्म के कुछ समय बाद जब बच्चों में अलग-अलग लक्षण दिखने लगते हैं तब हकीकत धीरे-धीरे सामने आती हैं। किसी को डाउन सिंड्रोम का सामना करना पड़ता हैं, किसी को ऑटिज्म का।

ऑटिज़्म से पीड़ित व्यक्ति का दिमाग दूसरों से अलग तरीकें से काम करता हैं, जिससे सामाजिक संपर्क, संवाद करने, और कुछ खास तरह के व्यवहारों में कठिनाई होती हैं, कई माता-पिता स्वीकार करते हैं की वे मानसिक रुप से इसके लिए तैयार नहीं थे। किसी के फूट-फूटकर रोने की बात कहीं तो किसी ने क्षणिक कमज़ोर पल में बच्चे को कहीं छोड़ आने जैसे विचारों को भी स्वीकार।
जानिए रात अकेली हैं 2 फिल्म की कहानी के बारे में।
डाउन सिंड्रोम जैसी बीमारी बनी एक चुनौती- Down Syndrome jaisi bimari bani ek chunauti
अपने दर्द को उन्होंने कभी किसी से साझा नहीं किया। परवरिश की चुनौतियाँ यहाँ विस्तार से उभरती हैं। समाज की असंवेदनशीलता, रिश्तेदारों के ताने, पड़ोसियों की अपेक्षा और सामान्य बच्चों का असामान्य व्यवहार ये सब बच्चों के साथ माता-पिता के मन पर गहरे घाव छोड़ते हैं।

जन्मदिन की पार्टियों में न बुलाया जाना, स्कूल में अलग-थलग किया जाना ये छोटी-छोटी घटनाएँ माता-पिता के लिए असहनीय पीड़ा बन जाती हैं। कुछ माता-पिता ने संगीत, कला और खेल की थेरेपी के रुप में अपनाया ताकि बच्चे उसमें आगे बढ़ सकें और आत्मविश्वास पा सकें। भले ही ये बच्चे तेज़ी से न सीखें, लेकिन सीखते जरुर हैं।
ऋषि शाहनी इसका जीवंत उदाहरण हैं, जिसने साल 1999 में तैराकी में पैरा-ओलंपिक गोल्ड मेडल जीतकर यह सिद्ध किया की सीमाएँ अक्सर समाज तय करता हैं, क्षमताएँ नहीं। कैमरा इन बच्चों की भावनात्मक दुनिया में झांकता हैं जहाँ वे प्यार, दोस्ती, गर्लफ्रेंड और शादी जैसे इच्छाएँ रखते हैं, जिन्हें अक्सर समाज नज़रअंदाज करता हैं।
आवश्यक जानकारी:- मिसेज देशपांडे वेब सीरिज़ की कहानी के बारे में।
निष्कर्ष- Conclusion
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