प्राचीन द्वारका नगरी: समुद्र में डूबी स्वर्णिम सभ्यता

Vineet Bansal

आज हम आपसे चर्चा करने जा रहे हैं द्वारका के बारे में। अब हम आपसे द्वारका के बारे में बात करें तो द्वारका भारत के गुजरात राज्य में स्थित एक प्राचीन और अत्यंत पवित्र नगर हैं। द्वारका हिंदू धर्म के चार धामों में से एक हैं और भगवान श्रीकृष्ण की कर्मभूमि तथा राजधानी के रुप में प्रसिद्ध हैं। द्वारका को “सोने की नगरी” भी कहते हैं क्योंकि माना जाता हैं की श्रीकृष्ण ने इसको अत्यंत भव्य और समृद्ध रुप में बसाया था। अब हम आपसे चर्चा करेंगे द्वारका के परिचय के बारे में।

Contents
द्वारका का परिचय- Dwarka ka parichayद्वारका का धार्मिक महत्तव- Dwarka ka dharmik mahatvaद्वारका का ऐतिहासिक पृष्ठभूमि- Dwarka ka aitihasik prishthbhoomiपौराणिक काल में द्वारकापुराणों में उल्लेखसमुद्र में विलीन होने की कथाऐतिहासिक द्वारका का विकासद्वारकाधीश मंदिर का वर्णन- Dwarkadhish Mandir ka varnanमंदिर का इतिहासवास्तुकला की भव्यतागर्भगृह और भगवान का स्वरुपमंदिर परिसर और अन्य सरंचनाएँमंदिर की धार्मिक महत्तागोमती घाट और निर्मल वातावरणरुक्मिणी देवी मंदिर का महत्तव- Rukmini Devi Mandir ka mahatvaरुक्मिणी देवी का दिव्य स्वरुपमंदिर की पौराणिक कथामंदिर की स्थापत्य कलाभक्तों के लिए धार्मिक महत्तवरुक्मिणी-कृष्ण दर्शन का महत्तवधार्मिक परंपराएँ और अनुष्ठानद्वारका में मनाए जाने वाले प्रमुख त्योहार- Dwarka mein manaye jane wale pramukh tyoharजन्माष्टमीरथ यात्राहोली और धुलेटीदीपावली और अन्नकूटरुक्मिणी विवाहोत्सवरुक्मिणी अष्टमीमकर संक्रांतिदेव दीपावलीनिष्कर्ष- Conclusion

द्वारका का परिचय- Dwarka ka parichay

अब हम आपसे चर्चा करने जा रहे हैं द्वारका के परिचय के बारे में। अब हम आपसे द्वारका के परिचय के बारे में बात करें तो द्वारका भारत के पश्चिमी तट पर स्थित गुजरात राज्य का एक प्राचीन और पवित्र नगर हैं। द्वारका हिंदू धर्म के चार धामों में से एक हैं और भगवान श्रीकृष्ण की नगरी के रुप में विश्वभर में प्रसिद्ध हैं।

Dwarka ka parichay

पुराणों के अनुसार, महाभारत काल में श्रीकृष्ण ने मथुरा छोड़कर समुद्र तट पर इस भव्य और सुरक्षित नगरी की स्थापना की थी, जिसको बाद में “द्वारका” के नाम से जाना गया हैं।

द्वारका का उल्लेख वेदों, पुराणों और महाभारत जैसे प्राचीन ग्रंथों में मिलता हैं। इसको “स्वर्ण नगरी” या “द्वारावती” भी कहते हैं। समुद्र के बीच मिली प्राचीन सरचनाएँ और पुरातत्व अनुसंधान बताते हैं की यहाँ एक अत्यंत विकसित और समृद्ध नगर रहा होगा जो आज भी रहस्य और आकर्षण का केंद्र रहा हैं।

गोमती नदी के किनारे स्थित द्वारका आध्यात्मिकता, इतिहास, संस्कृति और समुद्री सुंदरता का सम्मिलित रुप हैं। द्वारका में स्थित द्वारकाधीश मंदिर दुनिया के सबसे प्रमुख कृष्ण मंदिरो में से एक हैं और प्रतिवर्ष लाखों तीर्थयात्रियों का केंद्र रहा हैं। अब हम आपसे चर्चा करेंगे द्वारका के धार्मिक महत्तव के बारे में।

द्वारका का धार्मिक महत्तव- Dwarka ka dharmik mahatva

अब हम आपसे चर्चा करने जा रहे हैं द्वारका के धार्मिक महत्तव के बारे में। अब हम आपसे द्वारका के धार्मिक महत्तव के बारे में बात करें तो हिंदू धर्म का द्वारका एक प्रमुख और अत्यंत पवित्र तीर्थ स्थल हैं।

Dwarka ka dharmik mahatva

यह भगवान श्रीकृष्ण की राजधानी और उनकी अनेक लीलाओं की पावन भूमि होने के कारण करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र हैं। द्वारका को चार धाम में पश्चिम दिशा का धाम माना जाता हैं और अन्य तीन हैं- बद्रीनाथ, जगन्नाथ पुरी और रामेश्वरम। ऐसा माना जाता हैं की इन चारों धामों के दर्शन करने से मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती हैं।

द्वारका का वर्णन स्कंद पुराण, भागवत पुराण, महाभारत और विष्णु पुराण सहित अनेक ग्रंथों में मिलता हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार द्वारका भगवान श्रीकृष्ण द्वारा स्वयं बसाई गई थी और यहाँ उन्होंने यदुवंश का शासन संभाला था। द्वारका में स्थित प्रसिद्ध द्वारकाधीश मंदिर में श्रीकृष्ण का “राजाधिराज” के रुप में पूजन होता हैं। यह मंदिर आस्था, अध्यात्म और भक्ति का महान केंद्र हैं।

बेट द्वारका, रुक्मिणी देवी मंदिर, गोमती घाट और नागेश्वर ज्योतिर्लिंग जैसे तीर्थ स्थान द्वारका के धार्मिक महत्तव को और भी बढ़ाते हैं। यहाँ आने वाले भक्त मानते हैं की द्वारका के दर्शन मात्र से पापों का नाश होता हैं और जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती हैं। अब हम आपसे चर्चा करेंगे द्वारका के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के बारे में।

द्वारका का ऐतिहासिक पृष्ठभूमि- Dwarka ka aitihasik prishthbhoomi

अब हम आपसे चर्चा करने जा रहे हैं द्वारका के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के बारे में। अब हम आपसे द्वारका के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के बारे में बात करें तो द्वारका भारत के सबसे प्राचीन और महत्तवपूर्ण नगरों में से एक हैं, जिसका इतिहास पौराणिक काल से लेकर आधुनिक युग तक फैला हुआ हैं।

Dwarka ka aitihasik prishthbhoomi

द्वारका का उल्लेख वेदों, पुराणों, महाभारत और अनेक प्राचीन ग्रंथों में मिलता हैं। ऐतिहासिक और पुरातात्विक दृष्टि से यह स्थान अत्यंत महत्तवपूर्ण रहा हैं।

पौराणिक काल में द्वारका

भागवत पुराण और महाभारत के अनुसार, जब मथुरा पर निरंतर आक्रमण होने लगे तब भगवान श्रीकृष्ण ने यदुवंश की सुरक्षा के लिए सागर तट पर एक नए नगर की स्थापना की थी।

यह नगरी इतनी भव्य और सुदृढ़ थी की इस नगरी को “द्वारवती” या “सोने की नगरी” भी कहा जाता हैं। कथा के अनुसार, यह नगर समुद्र के ऊपर और नीचे दोनों भागों में फैला हुआ था जो उस समय की उन्नत नगरीय योजना का संकेत हैं।

पुराणों में उल्लेख

विष्णु पुराण, हरिवंश पुराण और स्कंद पुराण में द्वारका को अत्यंत समृद्ध, सुव्यवस्थित और शक्तिशाली राज्य के रुप में वर्णित किया गया हैं। कृष्ण के शासन में यह राजनीतिक आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक गतिविधियों का बड़ा केंद्र था।

समुद्र में विलीन होने की कथा

प्राचीन ग्रंथों में उल्लेख हैं की श्रीकृष्ण के स्वर्गारोहण के बाद द्वारका समुद्र में विलीन हुई थी। यह घटना “प्राकृतिक परिवर्तन” और “राजवंश के अंत” का प्रतीक मानी जाती हैं। आज भी समुद्र के अंदर मिलने वाले अवशेषों को इस कथा से जोड़ा जाता हैं।

ऐतिहासिक द्वारका का विकास

समुद्र तटीय परिस्थितियों और समय के साथ कई बार नगर बसा और उजड़ा। वर्तमान द्वारका का बड़ा हिस्सा मध्यकाल और आधुनिक काल में मंदिरों और तीर्थ स्थलों के रुप में विकसित हुआ था।

विशेष रुप से 15वीं-16वीं शताब्दी में द्वारकाधीश मंदिर का पुनर्निमाण और विस्तार हुआ था। अब हम आपसे चर्चा करेंगे द्वारकाधीश मंदिर के वर्णन के बारे में।

द्वारकाधीश मंदिर का वर्णन- Dwarkadhish Mandir ka varnan

अब हम आपसे चर्चा करने जा रहे हैं द्वारकाधीश मंदिर के वर्णन के बारे में। अब हम आपसे द्वारकाधीश मंदिर के वर्णन के बारे में बात करें तो द्वारकाधीश मंदिर जिसको “जगतर मंदिर” के नाम से जाना जाता हैं।

Dwarkadhish Mandir ka varnan

द्वारकाधीश मंदिर द्वारका का सबसे प्रमुख और पवित्र मंदिर हैं। यह मंदिर भगवान श्रीकृष्ण के द्वारकाधीश या राजाधिराज रुप को समर्पित हैं। गोमती नदी के तट पर स्थित यह मंदिर इतिहास, वास्तुकला, भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा का अद्भुत संगम हैं।

मंदिर का इतिहास

द्वारकाधीश मंदिर का उल्लेख कई पुराणों और प्राचीन ग्रंथों में मिलता हैं। माना जाता हैं की इस मंदिर का मूल निर्माण कृष्ण के पौत्र वज्रनाभ ने करवाया था। वर्तमान सरंचना मध्यकाल में पुनर्निमित की गई और समय-समय पर कई राजाओं और भक्तों ने इस मंदिर का विस्तार किया था।

वास्तुकला की भव्यता

यह मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसकी शानदार नागर शैली की वास्तुकला हैं। यह मंदिर लगभग 5 मंजिला ऊँचा हैं। यह बिना किसी सहारे के खड़ी 72 पुष्ट स्तंभों पर आधारित हैं। इस शिखर की ऊँचाई लगभग 78 मीटर मानी जाती हैं।

इस मंदिर के मुख्य शिखर पर फहराती विशाल पताका प्रतिदिन कई बार बदलती हैं। इस मंदिर का पताका लगभग 52 गज लंबा होता हैं और श्रीकृष्ण के 52 कुलों का प्रतीक माना जाता हैं।

गर्भगृह और भगवान का स्वरुप

इस मंदिर के गर्भगृह में भगवान श्रीकृष्ण का अद्भुत काले पाषाण से निर्मित दिव्य स्वरुप स्थापित किया हैं। यह मूर्ति “द्वारकाधीश राजा” के रुप में हैं जो एक हाथ में शंख और दूसरे में गदा धारण किए हुए हैं। भक्तों का ऐसा मानना हैं की भगवान यहाँ अत्यंत जीवंत प्रतीत होते हैं और उनकी उपस्थिति का अनुभव मंदिर में गहरे तक अनुभव होता हैं।

मंदिर परिसर और अन्य सरंचनाएँ

इस मंदिर परिसर में अलग-अलग देवताओं के छोटे-छोटे मंदिर मौजूद हैं। विशेष रुप से देवकी माता, वासुदेव, रुक्मिणी माता, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध के छोटे मंदिर यहाँ देखे जा सकते हैं।

मंदिर की धार्मिक महत्ता

इन चार धामों में से पश्चिम दिशा का धाम होने के कारण इस मंदिर का विशेष स्थान हैं। प्रतिवर्ष लाखों भक्त श्रीकृष्ण का आशीर्वाद लेने आते हैं। जन्माष्टमी, रथ यात्रा और मुकुट दर्शन जैसे पर्व यहाँ अत्यंत धूमधाम से मनाए जाते हैं। इस मंदिर के ध्वज को चढ़ाना भक्तों के लिए सबसे बड़ा पुण्य माना जाता हैं।

गोमती घाट और निर्मल वातावरण

इस मंदिर से निकलते ही गोमती नदी के पवित्र घाट दिखाई देते हैं, जहाँ स्नान करना अत्यंत शुभ माना जाता हैं। इस मंदिर के निकट समुद्र तट और नदी का संगम आध्यात्मिक वातावरण को और भी पवित्र बनाता हैं। अब हम आपसे चर्चा करेंगे रुक्मिणी देवी मंदिर के महत्तव के बारे में।

रुक्मिणी देवी मंदिर का महत्तव- Rukmini Devi Mandir ka mahatva

अब हम आपसे चर्चा करने जा रहे हैं रुक्मिणी देवी मंदिर के महत्तव के बारे में। अब हम आपसे रुक्मिणी देवी मंदिर के महत्तव के बारे में बात करें तो द्वारका का रुक्मिणी देवी मंदिर एक अत्यंत पवित्र और ऐतिहासिक मंदिर हैं जो भगवान श्रीकृष्ण की पत्नी तथा लक्ष्मी के अवतार रुक्मिणी देवी को समर्पित हैं।

Rukmini Devi Mandir ka mahatva

यह मंदिर द्वारकाधीश मंदिर से लगभग 2-3 किलोमीटर दूर स्थित हैं और द्वारका आने वाले श्रद्धालुओं के लिए अनिवार्य तीर्थ माना जाता हैं।

रुक्मिणी देवी का दिव्य स्वरुप

रुक्मिणी देवी को सौंदर्य, शील, प्रेम, भक्ति और त्याग की मूर्ति माना जाता हैं। भागवत पुराण के अनुसार वे विदर्भ के राजा भीष्मक की पुत्री और श्रीकृष्ण की प्रियतम पत्नी थीं। इस मंदिर में स्थापित देवी का सुंदर मूर्ति-रुप भक्तों को शांति, करुणा और सौभाग्य का आशीर्वाद देता हैं।

मंदिर की पौराणिक कथा

एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, एक बार भगवान कृष्ण और रुक्मिणी देवी ऋषि दुर्वासा से मिलने गए थे। यह यात्रा लंबी थी, इसलिए रुक्मिणी देवी ने पानी पी लिया। ऋषि दुर्वासा को यह व्यवहार अस्वीकृत लगा और उन्होंने शाप दिया की कभी भी रुक्मिणी कृष्ण के साथ एक ही स्थान पर नहीं रहेगी।

इस श्राप के कारण रुक्मिणी देवी का मंदिर द्वारकाधीश मंदिर से दूर बना हुआ हैं। इस घटना को भक्त “ईश्वर की इच्छा” और “मानव कर्मों का फल” के रुप में देखते हैं।

मंदिर की स्थापत्य कला

यह मंदिर लगभग 12-13वीं शताब्दी का माना जाता हैं। इसकी नक्काशीदार दीवारें, स्तंभों पर उकेरी गई कलाकृतियाँ और सुंदरता इसकी प्राचीनता का प्रमाण हैं। इस मंदिर की दीवारों पर विभिन्न देवी-देवताओं, अप्सराओं और पौराणिक आकृतियाँ की विस्तृत कला दिखाई देती हैं। यह मंदिर लाल और पीले पत्थरों से निर्मित देखने में अत्यंत आकर्षक हैं।

भक्तों के लिए धार्मिक महत्तव

रुक्मिणी देवी को घर-गृहस्थी, वैवाहिक जीवन, सौभाग्य और समृद्धि की अधिष्ठात्री माना जाता हैं। यहाँ पूजा करने से दांपत्य जीवन में प्रेम बढ़ता हैं। पारिवारिक कलह दूर होता हैं और आर्थिक समृद्धि और शांति मिलती हैं। विशेष रुप से कई भक्त संतान प्राप्ति और सौभाग्य-सिद्धि के लिए यहाँ दर्शन करते हैं।

रुक्मिणी-कृष्ण दर्शन का महत्तव

द्वारका यात्रा में पहले द्वारकाधीश और बाद में रुक्मिणी देवी के दर्शन को अत्यंत शुभ माना जाता हैं। भक्त यह मानते हैं की श्रीकृष्ण की कृपा तब पूर्ण होती हैं जब उनकी प्रिया रुक्मिणी का आशीर्वाद प्राप्त हो जाए।

धार्मिक परंपराएँ और अनुष्ठान

रुक्मिणी अष्टमी और रुक्मिणी विवाह के दिन मंदिर में विशेष पूजा और उत्सव होते हैं। भक्त यहाँ जलाभिषेक, चड़ी पाठ और दंपत्ति सुख के विशेष अनुष्ठान कराते हैं। इस मंदिर में दी जाने वाली प्रसादी सौभाग्य का प्रतीक मानी जाती हैं। अब हम आपसे चर्चा करेंगे द्वारका में मनाए जाने वाले प्रमुख त्योहारों के बारे में।

द्वारका में मनाए जाने वाले प्रमुख त्योहार- Dwarka mein manaye jane wale pramukh tyohar

अब हम आपसे चर्चा करने जा रहे हैं द्वारका में मनाए जाने वाले प्रमुख त्योहारों के बारे में। अब हम आपसे द्वारका में मनाए जाने वाले प्रमुख त्योहारों के बारे में बात करें तो द्वारका भगवान श्रीकृष्ण की पावन नगरी, धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध हैं।

Dwarka mein manaye jane wale pramukh tyohar

यहाँ वर्षभर भक्ति, उत्साह और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरे अनेक त्योहार मनाए जाते हैं। इन सब त्योहारों में हज़ारों-लाखों भक्त शामिल होते हैं। जिससे द्वारका का वातावरण अत्यंत पावन और जीवंत हो उठता हैं।

जन्माष्टमी

जन्माष्टमी द्वारका का सबसे बड़ा और महत्तवपूर्ण उत्सव हैं। यह भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रुप में मनाया जाता हैं। जन्माष्टमी के दिन यहाँ रात 12 बजे महाभिषेक और मंगल आरती, मंदिर में विशेष झूला सजावट, कृष्ण लीलाओं का मंचन और भक्तों का विशाल समूह और दर्शन की लंबी कतारें होती हैं। इस दिन द्वारकाधीश मंदिर का सौंदर्य और भव्यता देखते ही बनती हैं।

रथ यात्रा

जगन्नाथ पुरी की तरह द्वारका में रथ यात्रा बड़े धूमधाम से मनाई जाती हैं। इस दिन भगवान द्वारकाधीश विशेष रथ पर नगर भ्रमण करते हैं। इस उत्सव में हज़ारों भक्त रस्सी खींचते हुए रथ को आगे बढ़ाते हैं। भजन-कीर्तन, नृत्य, संकीर्तन का आयोजन किया जाता हैं। शहर में आध्यात्मिक वातावरण का सृजन किया जाता हैं।

होली और धुलेटी

द्वारका में होली और इसके अगले दिन मनाई जाने वाली धुलेटी का विशेष महत्तव होता हैं। कृष्ण की लीलाओं की परंपरा के अनुसार रंग-गुलाल, भजन और नृत्य से पूरा शहर आनंद मय हो उठता हैं।

दीपावली और अन्नकूट

दीपावली पर द्वारका का पूरा शहर दीपोंं से जगमगा उठता हैं। दीपावली के अगले दिन अन्नकूट महोत्सव भी मनाया जाता हैं। इस दिन भगवान द्वारकाधीश को 56 भोग अर्पित, विशाल प्रसाद वितरण और मंदिरों में भव्य सजावट किया जाता हैं।

रुक्मिणी विवाहोत्सव

यह उत्सव रुक्मिणी देवी और श्रीकृष्ण के दिव्य विवाह का प्रतीक हैं। इस मौके पर रुक्मिणी देवी मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना और शोभायात्राएँ भी निकाली जाती हैं।

रुक्मिणी अष्टमी

रुक्मिणी अष्टमी पौष माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती हैं। इस दिन रुक्मिणी देवी की आराधना, व्रत और विशेष कथा पाठ होते हैं। परिवार में सुख-शांति और दांपत्य-सौभाग्य के लिए भक्त यहाँ विशेष रुप से आते हैं।

मकर संक्रांति

मकर संक्रांति के दिन समुद्र और गोमती घाट पर विशेष स्नान और पूजा की जाती हैं। इससे द्वारका में सूर्य पूजा और दान का विशेष महत्तव माना जाता हैं।

देव दीपावली

कार्तिक पूर्णिमा पर मनाया जाने वाला यह पावन त्योहार गोमती घाट और मंदिर परिसर को हज़ारों दीपों से सजाकर अद्भुत दिव्यता का अनुभव कराता हैं।

निष्कर्ष- Conclusion

ये हैं द्वारका नगर से संबंधित जानकारियाँ हम आपसे आशा करते हैं की आपको जरुर पसंद आई होगी। इस जानकारी से आपको द्वारका नगर के धार्मिक महत्तव से संबंधित हर प्रकार की जानकारियाँ आपको जरुर प्राप्त होंगी।

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मैं रोज़ाना की खबरों पर लिखने के लिए प्रेरित हूँ और भारत की सभी खबरों को कवर करता हूँ। मेरा लक्ष्य पाठकों को ताज़ा जानकारी प्रदान करना है, जो उन्हें समाचार की समझ और देशव्यापी घटनाओं की खोज में मदद करे।
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