आज हम आपसे चर्चा करने जा रहे हैं संकष्टी चतुर्थी व्रत के बारे में। अब हम आपसे संकष्टी चतुर्थी व्रत के बारे में बात करें तो संकष्टी चतुर्थी भगवान श्री गणेश को समर्पित व्रत हैं।
यह हर माह कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाई जाती हैं। संकष्टी चतुर्थी के दिन गणेश भक्त श्रद्धा से उपवास रखते हैं और चंद्र दर्शन के बाद व्रत का पारण करते हैं। अब हम आपसे चर्चा करेंगे संकष्टी चतुर्थी व्रत के परिचय के बारे में।
संकष्टी चतुर्थी व्रत का परिचय- Sankashti Chaturthi Vrat ka parichay
अब हम आपसे चर्चा करने जा रहे हैं संकष्टी चतुर्थी व्रत के परिचय के बारे में। अब हम आपसे संकष्टी चतुर्थी व्रत के परिचय के बारे में बात करें तो हिंदू धर्म में संकष्टी चतुर्थी व्रत भगवान श्री गणेश को समर्पित एक अत्यंत शुभ और पूजनीय व्रत हैं।

संकष्टी चतुर्थी व्रत प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता हैं। “संकष्टी” शब्द का अर्थ हैं संकटों का नाश करने वाली और “चतुर्थी” का अर्थ हैं चंद्र मास की चौथी तिथि।
इस व्रत का मुख्य उद्देश्य जीवन के सब कष्टों, विघ्नों और बाधाओं को दूर करना होता हैं। इस दिन भक्तगण भगवान गणेश की पूजा करके उनसे बुद्धि, ज्ञान, समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति की कामना करते हैं।
संकष्टी चतुर्थी का पालन पूरे भारत में विशेष रुप से महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और दक्षिण भारत में अति श्रद्धा और भक्ति से किया जाता हैं।
इस दिन व्रती दिनभर उपवास रखता हैं और रात्रि में चंद्र दर्शन के बाद गणेश जी को अर्घ्य देकर व्रत का पारण करता हैं। यह माना जाता हैं की जो व्यक्ति श्रद्धा और नियमपूर्वक इस व्रत का पालन करता हैं, उसके जीवन के सब संकट मिट जाते हैं और उसे गणपति कृपा प्राप्त होती हैं। अब हम आपसे चर्चा करेंगे संकष्टी चतुर्थी की तिथि और पहचान के बारे में।
संकष्टी चतुर्थी की तिथि और पहचान- Sankashti Chaturthi ki tithi aur pehchan
अब हम आपसे चर्चा करने जा रहे हैं संकष्टी चतुर्थी की तिथि और पहचान के बारे में। अब हम आपसे संकष्टी चतुर्थी की तिथि और पहचान के बारे में बात करें तो प्रत्येक हिंदू मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को संकष्टी चतुर्थी व्रत मनाया जाता हैं। वर्ष में कुल 12 संकष्टी चतुर्थियाँ होती हैं और प्रत्येक का अपना विशेष नाम, माह और महत्तव होता हैं। दिसंबर 2025 में संकष्टी चतुर्थी 7 दिसंबर 2025 को हैं।

कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि चंद्रमा के दर्शन से जुड़ी होती हैं, इसलिए इस व्रत का पारण भी रात्रि में चंद्र दर्शन के बाद ही किया जाता हैं। चतुर्थी तिथि सूर्यास्त के बाद तक रहे तो उसी दिन संकष्टी चतुर्थी मानी जाती हैं।
तिथि निर्धारण का तरीका
यह व्रत हर महीने कृष्ण पक्ष की चौथी तिथि को आता हैं। पंचांग के अनुसार चंद्र दर्शन का समय निर्धारित किया जाता हैं। इस व्रत का समापन चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद किया जाता हैं। यदि चतुर्थी तिथि मंगलवार को पड़े तब उसे “अंगारकी संकष्टी चतुर्थी” भी कहते हैं जो अत्यंत शुभ और दुर्लभ मानी जाती हैं।
संकष्टी चतुर्थी की पहचान
यह व्रत भगवान विघ्नहर्ता गणेश को समर्पित होता हैं। इस दिन लोग गणेश मंदिरों में दीपदान करते हैं और “ओउम् गं गणपतये नम:” मंत्र का जप करते हैं। भक्त दिनभर उपवास रखकर सिर्फ फल या पानी ग्रहण करते हैं।
रात्रि में गणेश पूजन, चंद्र दर्शन और अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया जाता हैं। इस दिन गणेश पुराण में वर्णित संकष्टी चतुर्थी कथा का श्रवण या पाठ करने की परंपरा हैं। अब हम आपसे चर्चा करेंगे संकष्टी चतुर्थी व्रत की तैयारी और संकल्प विधि के बारे में।
जानिए गणेश चतुर्थी के पर्व के महत्तव के बारे में।
संकष्टी चतुर्थी व्रत की तैयारी और संकल्प विधि- Sankashti Chaturthi Vrat ki taiyari aur sankalp vidhi
अब हम आपसे चर्चा करने जा रहे हैं संकष्टी चतुर्थी व्रत की तैयारी और संकल्प विधि के बारे में। अब हम आपसे संकष्टी चतुर्थी व्रत की तैयारी और संकल्प विधि के बारे में बात करें तो संकष्टी चतुर्थी का व्रत आरम्भ करने से पहले भक्त को कुछ विशेष तैयारियाँ और शुद्ध आचरण का पालन करना चाहिए।

संकष्टी का व्रत न सिर्फ शारीरिक उपवास हैं बल्कि मन, वचन और कर्म की पवित्रता का प्रतीक हैं।
व्रत की तैयारी
- पंचांग देखना:- सबसे पहले स्थानीय पंचांग या कैलेंडर से संकष्टी चतुर्थी की सही तिथि और चंद्र दर्शन का समय जान लें।
- स्थान की शुद्धि:- जिस स्थान पर पूजा करनी हैं, उसे जल छिड़कर शुद्ध करें और वहाँ एक स्वच्छ पीला या लाल वस्त्र बिछाएँ।
- पूजा साम्रगी तैयार करें:- भगवान गणेश की मूर्ति या चित्र, दुर्वा, ताज़े फूल, दीपक, धूप, कपूर, रोली, चावल, अक्षत, मोदक, लड्डू, फल, नैवेद्य, एक कलश, जल, थाली, चंद्र अर्घ्य हेतु दूध और जल मिश्रण।
- व्रत का भोजन नियम:- व्रतधारी सुबह से संकल्प लेकर दिनभर निर्जला या फलाहार उपवास रखता हैं। अन्न, नमक और तामसिक पदार्थों का सेवन वर्जित हैं।
संकल्प विधि
प्रात: स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण कर लें। पूर्व या उत्तर दिशा की और मुख करके गणेश जी का ध्यान कर लें। अपने दाएँ हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर व्रत का संकल्प लें।
संकल्प के बाद गणपति पूजा आरम्भ करें। उन्हें पुष्प, फल, दूर्वा, मोदक, दीप और धूप अर्पित कर लें। ‘ओउम् गं गणपतये नम:’ मंत्र का जप कर लें।
दिनभर आप भक्ति भाव से व्रत का पालन करें और सायंकाल चंद्र दर्शन की तैयारी कर लें। अब हम आपसे चर्चा करेंगे संकष्टी चतुर्थी के दौरान उपवास नियम के बारे में।
संकष्टी चतुर्थी के दौरान उपवास नियम- Sankashti Chaturthi ke dauran upvas niyam
अब हम आपसे चर्चा करने जा रहे हैं संकष्टी चतुर्थी के दौरान उपवास नियम के बारे में। अब हम आपसे संकष्टी चतुर्थी के दौरान उपवास नियम के बारे में बात करें तो संकष्टी चतुर्थी का व्रत सिर्फ पूजा का नहीं, बल्कि शारीरिक और मानसिक संयम का प्रतीक हैं।

इस दिन व्रती भगवान श्री गणेश की कृपा प्राप्त करने के लिए पूर्ण श्रद्धा और नियमों के साथ उपवास करता हैं।
व्रत की शुरुआत
व्रतधारी व्यक्ति प्रात: स्नान करके गणेश जी का ध्यान करता हैं और संकल्प मंत्र बोलकर उपवास का आरम्भ करता हैं। व्रत सूर्योदय से लेकर चंद्र दर्शन तक रखा जाता हैं।
उपवास के प्रकार
संकष्टी चतुर्थी का व्रत व्यक्ति अपनी क्षमता और श्रद्धा के अनुसार निम्न प्रकार से करता हैं:-
- निर्जला व्रत:- पूरे दिन कुछ भी न खाकर और न पीकर उपवास रखा जाता हैं। यह व्रत सबसे कठिन किंतु अत्यंत फलदायी माना जाता हैं।
- फलाहार व्रत:- दिनभर सिर्फ फल, दूध, चाय और पानी लिया जा सकता हैं। अन्न, नमक और तामसिक भोजन वर्जित हैं।
- एकभुक्त व्रत:- भक्त दिनभर पूजा और जप करके रात्रि में चंद्र दर्शन के बाद एक बार फलाहार करता हैं।
क्या नहीं खाना चाहिए
अनाज, दालें, नमक, प्याज, लहसुन, मसालेदार, तामसिक भोजन, मांस, मछली, अंडा या शराब का सेवन सख्त वर्जित होता हैं। किसी का अपमान, झूठ बोलना या क्रोध करना त्याज्य माना जाता हैं।
व्रत के दौरान पालन करने योग्य बातें
आप दिनभर ‘ओउम् गं गणपतये नम:’ मंत्र का जप कर लें। गणेश जी को दूर्वा, मोदक, लड्डू और लाल फूल अर्पित करें। गणेश चतुर्थी व्रत कथा का पाठ या श्रवण अवश्य कर लें। संध्या के समय चंद्रमा का दर्शन करके उन्हें दूध, जल और फूलों से अर्घ्य दें। उसके बाद व्रत का पारण कर लें।
व्रत का पारण
रात्रि में चंद्र दर्शन के बाद गणेश जी को अर्घ्य देकर प्रार्थना करें। बाद में मोदक या गुड़-फल का प्रसाद ग्रहण करके व्रत पूर्ण कर लें। अब हम आपसे चर्चा करेंगे चंद्र दर्शन और अर्घ्य देने की विधि के बारे में।
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चंद्र दर्शन और अर्घ्य देने की विधि- Chandra darshan aur arghya dene ki vidhi
अब हम आपसे चर्चा करने जा रहे हैं चंद्र दर्शन और अर्घ्य देने की विधि के बारे में। अब हम आपसे चंद्र दर्शन और अर्घ्य देने की विधि के बारे में बात करें तो संकष्टी चतुर्थी व्रत का सबसे महत्तवपूर्ण और पवित्र चरण हैं- रात्रि में चंद्र दर्शन और अर्घ्य देना।

व्रत का पारण चंद्रमा को अर्घ्य अर्पित करने के बाद किया जाता हैं। यह चरण भगवान गणेश और चंद्रदेव दोनों की कृपा प्राप्त करने का प्रतीक होता हैं।
चंद्र दर्शन का महत्तव
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार चंद्रमा का संबंध शुद्धता, शीतलता और मन की स्थिरता से होता हैं। संकष्टी चतुर्थी की रात जब व्रती चंद्रमा को देखता हैं तब यह उस व्रती के जीवन से सब संकट और मानसिक क्लेशों के निवारण का प्रतीक हैं।
एक कथा के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण पर झूठे मणि-चोरी के आरोप तब लगे थे जब उन्होंने गणेश चतुर्थी के दिन चंद्रमा का दर्शन किया था। इसीलिए संकष्टी चतुर्थी की रात चंद्र दर्शन गणेश पूजन और अर्घ्य देने के बाद किया जाता हैं ताकि सब दोष समाप्त हों और शुभ फल प्राप्त हों।
अर्घ्य देने की तैयारी
रात्रि में पूजा समाप्त करने के बाद चाँद के उदय का समय देख लें। एक पीतल या तांबे के पात्र में स्वच्छ जल, दूध, फूल, अक्षत और दूर्वा रखें। दीपक और धूप जलाकर पूर्व दिशा की और मुख करके खड़े हों।
चंद्रमा को अर्घ्य देने की विधि
चंद्रमा का दर्शन करते हुए दोनों हाथ में जल से भरा पात्र लें। भगवान गणेश और चंद्रदेव का ध्यान कर लें। ‘ओउम् सोमाय नम:’ मंत्र का उच्चारण कर लें। मंत्र उच्चारण के बाद धीरे-धीरे जल चंद्रमा की दिशा में अर्पित कर लें। इसके बाद आप हाथ जोड़कर प्रार्थना करें की-
“हे चंद्रदेव और विघ्नहर्ता गणेश जी, मेरे जीवन के सब संकट, दोष और दुख दूर हों।”
अर्घ्य के बाद क्या करें
अर्घ्य देने के बाद गणेश जी को मोदक, लड्डू या गुड़ का नैवेद्य अर्पित कर लें। भगवान का स्मरण करते हुए व्रत का पारण कर लें। व्रतधारी व्यक्ति स्वयं भी थोड़ी मात्रा में प्रसाद ग्रहण कर लें।
चंद्र दर्शन का आध्यात्मिक अर्थ
चंद्रमा का दर्शन आत्मा की शुद्धता और मन की शांति का प्रतीक होता हैं। इस विधि से व्यक्ति के अंदर संयम, शांति और आत्मबल की वृद्धि होती हैं तथा भगवान गणेश की कृपा से सब संकटों का नाश होता हैं। अब हम आपसे चर्चा करेंगे संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा के बारे में।
संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा- Sankashti Chaturthi Vrat katha
अब हम आपसे चर्चा करेंगे संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा के बारे में। अब हम आपसे संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा के बारे में बात करें तो संकष्टी चतुर्थी व्रत से जुड़ी कई पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं, जिनमें से सबसे प्रसिद्ध कथा भगवान गणेश द्वारा चंद्रदेव के शाप मुक्ति और संकटमोचन स्वरुप से संबंधित हैं।

यह कथा गणेश पुराण और स्कंद पुराण में वर्णित हैं।
कथा का आरम्भ
एक बार देवताओं और ऋषियों ने भगवान शिव से निवेदन किया की
“हे महादेव! संसार के सब जीव पापों, दुखों और संकटों से ग्रस्त हैं। कृप्या ऐसा उपाय बताइए जिससे वे इन संकटों से मुक्त हो सकें।”
तभी भगवान शिव बोले की
“जो भी भक्त प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मेरे पुत्र गणेश का व्रत करेगा, उसके सब संकट दूर होंगे। यह व्रत ‘संकष्टी चतुर्थी’ कहलाएगा, और इसे करने वाला सर्व सिद्धि और सौभाग्य प्राप्त करेगा।”
गणेश और चंद्रदेव की कथा
एक बार भगवान गणेश अपने वाहन मूषक पर बैठकर सैर कर रहे थे। रात्रि का समय था और उन्होंने बहुत सारे मोदक और लड्डू खाए थे। इस समय मूषक के सामने एक साँप आ गया, जिससे डरकर मूषक उछल पड़ा। भगवान गणेश गिर पड़े और उनके पेट से सब लड्डू बिखर गए।
गणेश जी ने तुरंत उस साँप को पकड़ा और अपने पेट के चारों और बाँध लिया। उन्हें देखकर चंद्रदेव हँस पड़े।
गणेश जी ने चंद्रमा की हँसी को अपमान समझकर क्रोधित हो गए और बोले की
“हे चंद्रदेव! तुम्हारा यह घमंड व्यर्थ हैं। आज से तुम्हारा तेज़ नष्ट हो जाएगा। जो कोई भी तुम्हें देखेगा, उस पर झूठे आरोप और कलंक लगेंगे।”
चंद्रदेव भयभीत होकर क्षमा माँगने लगे और बोले की “हे गणेश जी, मुझसे भूल हो गई। कृप्या मुझे क्षमा करें।”
भगवान गणेश ने उनकी विनती सुनकर कहा की “हे चंद्रदेव, मेरा शाप पूर्णत: तो नहीं टलेगा, परंतु जो भी भक्त भाद्रपद मास की चतुर्थी को मेरी पूजा करके चंद्र दर्शन के साथ अर्घ्य देगा, उस पर चंद्रदेव का प्रभाव नहीं पड़ेगा। वह मेरे व्रत के पुण्य से सब संकटों से मुक्त होगा।”
व्रत का फल
जो भी भक्त संकष्टी चतुर्थी के दिन विधि-विधान से व्रत और पूजा करता हैं, उसके जीवन के सब कष्ट, रोग और बाधाएँ समाप्त हो जाती हैं। भगवान गणेश उसको सौभाग्य, बुद्धि और समृद्धि प्रदान करते हैं। उसके घर में शांति और सुख-समृद्धि का वास होता हैं।
कथा का संदेश
यह कथा हमें सिखाती हैं की अंहकार का विनाश ही सच्ची बुद्धि का आरम्भ हैं। भगवान गणेश का आशीर्वाद पाने के लिए व्यक्ति को विनम्रता, संयम और श्रद्धा के साथ व्रत करना चाहिए। अब हम आपसे चर्चा करेंगे ग्रहदोष निवारण में संकष्टी चतुर्थी के प्रभाव के बारे में।
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ग्रहदोष निवारण में संकष्टी चतुर्थी का प्रभाव- Grah Dosh nivaran mein sankashti chaturthi ka prabhav
अब हम आपसे चर्चा करने जा रहे हैं ग्रहदोष निवारण में संकष्टी चतुर्थी के प्रभाव के बारे में। अब हम आपसे ग्रहदोष निवारण में संकष्टी चतुर्थी के प्रभाव के बारे में बात करें तो संकष्टी चतुर्थी सिर्फ भक्ति नहीं, बल्कि ज्योतिषीय दृष्टि से अत्यंत प्रभावशाली दिन माना जाता हैं।

इस दिनि भगवान विघ्नहर्ता श्री गणेश की उपासना करने से ग्रहदोष, पितृदोष और मानसिक क्लेश समाप्त होते हैं। गणपति जी को “ग्रहों के अधिपति और बुद्धि तथा विवेक के स्वामी” भी कहते हैं।
गणेश जी और ग्रहों का संबंध
भगवान गणेश को सब नवग्रहों का नियंता माना जाता हैं। किसी भी शुभ कार्य, पूजा या ग्रहशांति यज्ञ से पहले गणेश पूजन का विधान इसी वजह से किया जाता हैं। वे राहु, केतु, शनि और मंगल जैसे क्रूर ग्रहों के दुष्प्रभाव को शांति में बदलने की शक्ति रखते हैं।
संकष्टी चतुर्थी और चंद्रदेव निवारण
संकष्टी चतुर्थी का व्रत का सबसे प्रमुख प्रभाव चंद्रदोष से मुक्ति दिलाने में होता हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, गणेश जी ने चंद्रमा को शाप दिया था जो सिर्फ चतुर्थी व्रत के अर्घ्य से शामिल होता हैं। जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक संकष्टी चतुर्थी का पालन करता हैं उस पर चंद्रमा के दोष का प्रभाव नहीं रहता हैं।
शनि, राहु, और केतु दोष में लाभ
जिन व्यक्ति की कुंडली में शनि की साढ़ेसाती, ढैया या राहु-केतु की दशा चल रही हो उन्हें संकष्टी चतुर्थी का व्रत करने से विशेष लाभ होता हैं। यह व्रत व्यक्ति को धैर्य, मानसिक स्थिरता और संकट निवारण की शक्ति प्रदान करता हैं।
‘ओउम् गं गणपतये नम:’ मंत्र का जाप करते हुए लाल दुर्वा और मोदक अर्पित करने से ग्रहों का क्रोध शांत होता हैं।
पितृदोष और कर्मदोष निवारण
गणेश जी को विघ्नहर्ता और कर्मफल नियंत्रक भी कहते हैं। संकष्टी चतुर्थी पर उनका व्रत करने से पितृदोष, पूर्वजों के असंतोष तथा पूर्व जन्म के कर्मदोष का प्रभाव कम होता हैं। यह व्रत आत्मिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता हैं।
ग्रहशांति के लिए विशेष उपाय
गणेश जी को दुर्वा की 21 पत्तियाँ अर्पित करें। लाल चंदन और सिंदूर से पूजन कर लें। “ओउम् श्री गं सौम्याय गणपतये नम:” मंत्र का 108 बार जाप कर लें। चंद्रमा को दूध और जल से अर्घ्य दें और मन ही मन ग्रहशांति की प्रार्थना कर लें।
ग्रहदोष निवारण का परिणाम
नियमित रुप से जो भक्त संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखता हैं। उसके ग्रह शुभ फल देना प्रारम्भ करते हैं। जीवन में स्थिरता, धन, बुद्धि और सौभाग्य की वृद्धि होती हैं। सब प्रकार के संकट, मानसिक बैचेनी और ग्रहबाधा समाप्त हो जाती हैं।
आवश्यक जानकारी:- शिव जी के अर्धनारीश्वर रुप की कथा के बारे में।
निष्कर्ष- Conclusion
ये हैं संकष्टी चतुर्थी व्रत से संबंधित जानकारियाँ हम आपसे आशा करते हैं की आपको जरुर पसंद आए। इस जानकारी को हासिल करने के बाद आपको संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा की कहानी से संबंधित हर प्रकार की जानकारियाँ प्राप्त होंगी।
इस जानकारी से आपको संकष्टी चतुर्थी व्रत के बारे में हर प्रकार की जानकारियाँ प्राप्त होंगी। अगर आपको हमारी दी हुई जानकारियाँ पसंद आए तो आप हमारी दी हुई जानकारियों को लाइक व कमेंट जरुर कर लें।
इससे हमें प्रोत्साहन मिलेगा ताकि हम आपको बहेतर-से-बहेतर जानकारियाँ प्राप्त करवा सकें। हमारा उद्देश्य आपको घुमराह करना नहीं हैं बल्कि आप तक सही जानकारियाँ प्राप्त करवाना हैं।
