आज हम आपसे चर्चा करने जा रहे हैं दुर्लभ प्रसाद की दूसरी शादी फिल्म के बारे में। अब हम आपसे दुर्लभ प्रसाद की दूसरी शादी फिल्म के बारे में बात करें तो यह फिल्म मुरली की कहानी हैं जो अपने विधुर पिता दुर्लभ की दूसरी शादी कराने का प्रयास करता हैं ताकि वह अपनी प्रेमिका से शादी कर सकें। बनारस की पृष्ठभूमि पर आधारित यह फिल्म सामाजिक बंदिशों और रिश्तों को दूसरा मौका देने के विचार पर केंद्रित हैं। दुर्लभ की मुलाकात अपनी पूर्व प्रेमिका बबीता से हो जाती हैं, जिससे कहानी में नया मोड़ आता हैं।
कई बार कहानियाँ किसी विशेष विषय को लेकर नेक इरादे के साथ बनाई जाती हैं। दुर्लभ प्रसाद की दूसरी शादी भी उनमें से हैं। इस फिल्म का विचार जिंदगी को दूसरा मौका देने, रिश्तों को नए नज़रिए से देखने और सामाजिक बंदिशों पर सवाल उठाने की मंशा से गढ़ा गया हैं।
पिता के लिए दुल्हन ढूंढ़ता हैं बेटा- Pita ke liye dulhan dhoondhta hain beta
बनारस की पृष्ठभूमि में बुनी गई यह कहानी मुरली प्रसाद के इर्द-गिर्द घूमती हैं जो अपने सैलून चलाने वाले पिता दुर्लभ और मामा के साथ रहता हैं। महक से मुरली प्रेम करता हैं, लेकिन उसके परिवार वाले अपनी बेटी की शादी एक ऐसे घर में करने से मना करते हैं, जहाँ कोई महिला नहीं हैं। ऐसे में मुरली अपने विधुर पिता की दोबारा शादी कराने का निर्णय करता हैं।

इस प्रयास में उसे परंपराओं, सामाजिक सोच और यहाँ तक की अपने ही पिता के विरोध का सामना करना पड़ता हैं। इन सब के दौरान दुर्लभ की मुलाकात अपनी पूर्व प्रेमिका बबीता से होती हैं। अभी सवाल यह हैं की क्या मुरली दोनों को मिलाकर अपनी शादी का रास्ता साफ कर पाएगा? यह कहानी इसी द्वंद्व के इर्द-गिर्द आगे बढ़ती हैं।
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क्या हैं फिल्म की सबसे बड़ी ताकत?- Kya hain film ki sabse badi takat?
इस फिल्म में आध्यात्मिक शहर बनारस को केवल बैंकग्राउंड के तौर पर नहीं, पात्र के तौर पर दिखाया गया हैं। इन सब के घाट, गलियाँ और रोज़मर्रा कर गतिविधियाँँ कहानी के सुर और भाव को उबारने में प्रभावी साबित होते हैं। इन सब के लिए सिनेमेटोग्राफर अनिल सिंह का योगदान उल्लेखनीय हैं। उन्होंने वाराणसी और उसके घाटों को खूबसूरती और संवेदनशीलता के साथ कैमरे में उतारा हैं।

दुल्हन की खोज को लेकर कभी ज्योतिषी की शरण में जाना, कभी देसी टिंडर जैसे प्लेटफॉर्म पर जाना, कभी पर्चा छपवाना तो कभी वर-वधू मेले में किस्मत आजमाना जैसे प्रसंग हैं। इन सब प्रयास में नई माँ के तौर पर एक दबंग महिला से सामना होता हैं।
ये सब ट्रैक कुछ हल्के-फुल्के हास्य के पल जरुर रचते हैं, लेकिन यह तलाश बहुत रोमांचक नहीं बन पाती हैं। इसमें भरपूर संभावना थी। पूर्वानुमानित कहानी होने के बावजूद निर्देशक सिद्धांत राज सिंह ने उसको अति नाटकीयता या लाउड होने से बचाया हैं। यह फिल्म की सबसे बड़ी ताकत हैं।
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निष्कर्ष- Conclusion
ये हैं दुर्लभ प्रसाद की दूसरी शादी फिल्म से संबंधित जानकारियाँ हम आपसे आशा करते हैं की आपको जरुर पसंद आई होगी। इस जानकारी से आपको दुर्लभ प्रसाद की दूसरी शादी फिल्म की कहानी से संबंधित हर प्रकार की जानकारियाँ अवश्य प्राप्त होंगी।
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